भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग कहां-कहां पर है? Lord Shiva Jyotirlinga

  

    भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग कहां-कहां पर है?

    भगवान शिव के बारह दिव्य ज्योतिर्लिंग 

    भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग कहां-कहां पर है? Lord Shiva Jyotirlinga | आपने भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग के बारे में तो सुना ही होगा | यह 12 ज्योतिर्लिंग भारत के अलग अलग प्रदेशों में स्थित हैं | इन सभी ज्योतिर्लिंग की अलग अलग विशेषताएँ और मान्यताएँ हैं | ये ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का दिव्य श्वरूप हैं | शिव पुराण में इन सभी ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता हैं | आज की इस पोस्ट में हम आपको इन सभी 12 ज्योतिर्लिंग के बारे बताने जा रहे हैं |
    ज्योतिर्लिंग |भगवान शिव के बारह दिव्य ज्योतिर्लिंग | Lord Shiva Jyotirlinga.

    1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग :-

    शिवपुराण में कोटिरूद्र संहिता में सोमनाथ को सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग कहा गया हैं जो गुजरात राज्य के सौराष्ट्र में स्थित हैं |गुजरात में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की बहुत मान्यता हैं | वहाँ के लोग इस सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की सच्चे मन से आराधना करते हैं |सौराष्ट्र में समुद्र किनारे बसे इस ज्योतिर्लिंग को दिव्य माना जाता हैं | कहा जाता हैं  कि भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही जीवन के सारे दुख, संकट, रोग दूर हो जाते हैं | चंद्रमा ने भगवान को आराध्य मानकर पुजा की और चंद्रमा को सोम भी कहा जाता हैं इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम सोमनाथ पड़ा |

    2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग :- 

    भगवान शिव का यह दिव्य ज्योतिर्लिंग आंद्रप्रदेश के श्री सैलम नमक स्थान पर स्थित हैं | शिवपुराण के कोटिरुद्र संहिता में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता हैं | माना जाता हैं इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन-आराधना करने से मनोकामना पूरी हो जाती हैं |
    इस ज्योतिर्लिंग में मल्लिका माता पार्वती का नाम हैं और अर्जुन भगवान शंकर को कहा जाता हैं | इसलिए यह ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से जगत में प्रसिद्ध हुआ है | माना जाता है कि सभी ज्योतिर्लिंग में यही मात्र एक ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहां माता सती के शरीर के अवशेष गिरे थे इसलिए इस स्थान में ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ स्थित हैं |

    3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग :-


    यह दिव्य ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के उज्जैन में सिपरा नदी के तट पर स्थित है | यह तीर्थ स्थल बाबा महाकाल के नाम से भी प्रसिद्ध है | मान्यता है कि भगवान शिव महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में दुष्टो का संहार और सच्चे मन के सज्जन व्यक्तियों की रक्षा करते है | इसलिए यह ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है |
    शिवपुराण में वर्णन है कि भगवान शिव ने महाकाल के रूप में दूषण नामक असुर का वध किया था और वहाँ के ब्राम्हणों से प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा | तब ब्राम्हणों ने भगवान शिव को सभी के कल्याण और रक्षा के लिए शिवलिंग में विराजने को कहा | भगवान शिव ब्राम्हणों को मोक्ष प्रदान कर शिवलिंग में विराजित हुये | इस तरह भगवान शिव महाकाल, महाकालेश्वर नाम से जगत में प्रसिद्ध हुये |

    4.  ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग :-


    भगवान शिव का यह दिव्य ज्योतिर्लिंग मध्यप्रदेश के शिवपुरी में नर्मदा नदी के किनारे मंधाता पर्वत पर स्थित है | ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही पुरुषार्थ, चतुष्ठय की प्राप्ति होती हैं |
    मध्यप्रदेश में इस ज्योतिर्लिंग की दो रूपों में पुजा की जाती है ,ओमकारेश्वर और अमलेश्वर | भगवान शिव के ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिव पुराण के कोटिरुद्रसंहिता के 18वें अध्याय में मिलता है |
    विंध्य पर्वत अपने आकार को बढ़ाने के लिए भगवान शिव की आराधना करने का निश्चय किया और एक स्थान पर पहुँचकर श्रद्धा और प्रेम पूर्वक शिवलिंग का निर्माण करके पूजा करनी शुरू की | विंध्य से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और अपने दिव्य श्वरूप के दर्शन दिये और विंध्य को मनचाहा वरदान प्रदान किया | उसी समय कुछ देवगन और ऋषि पहुँच गए | उन्होनें भी भगवान शिव की पूजा अर्चना की और भगवान शंकर से बोले – ” प्रभु आप इस शिवलिंग में हमेशा निवास करे”और भगवान शिव ने वहीं विद्यमान रहने का वचन दिया | फिर शिवलिंग दो रूपों में परिवर्तित हो गया | जिस शिवलिंग में भगवान शिव विद्यमान हुए वो ओमकार ज्योतिर्लिंग और दूसरा परमेश्वर लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुए | परमेश्वर लिंग को अमलेश्वर लिंग भी कहा जाता है |

    5.  केदारनाथ ज्योतिर्लिंग :-


    केदारनाथ धाम उत्तराखंड में अलकनन्दा और मन्दाकिनी नदियों के तट पर स्थित है | यहीं श्री नर और नारायण की आराधना, तप स्थल भी हैं | श्री नर और नारायण की प्रार्थना से ही भगवान शिव यहाँ विद्यमान हुए | नर और नारायण बद्री वन में अपने द्वारा निर्मित शिवलिंग की घोर तप किया करते थे | नर और नारायन की काफी समय तक घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव नर और नारायण के सामने प्रकट हुए और भगवान शिव ने उनसे वर मांगने को कहा | तब नर और नारायण ने भगवान शिव को लोक कल्याण के लिए शिवलिंग रूप में विद्यमान होने को कहा | और भगवान शिव केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विद्यमान हो गए |
    इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन और आराधना से लोगों के कष्ट दूर हो जाते हैं | वहीं नर और नारायन के दो पर्वत हैं | बद्री वन के पास ही भगवान बद्रीनाथ का भी मंदिर है | केदारनाथ नाथ धाम की यात्रा बहुत प्रसिद्ध है| माना जाता है कि केदारनाथ धाम की यात्रा करने से सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती हैं |

    6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग :-

    यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र में पुणे से 100 किमी. दूर स्थित हैं | इस ज्योतिर्लिंग की मोटाई काफी हैं | इस कारण भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता हैं | इस ज्योतिर्लिंग की मान्यता हैं कि जो इस शिवलिंग के दर्शन और पुजा अर्चना करता है उनकी मनोकामना पूरी और सातों जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं | वह मोक्ष की प्राप्ति करता हैं |
    शिवपुराण के कोटिरुद्र संहिता में वर्णन है भीम नाम का एक दैत्य हुआ करता था | अपनी माता कर्कटी ले साथ रहता था | एक दिन भीम ने अपनी माता से पूछा कि मेरे पिता कौन है? माता ने बताया कि तुम्हारे पिता कुंभकर्ण थे और राम ने उनका वध किया था | अपने पिता के मौत का पता चलने पर भीम क्रोधित हो उठा | उसने भगवान विष्णु और देवताओं से प्रतिशोध लेने की ठानी | उसने ब्रम्हदेव की लंबे समय तक तपस्या की | 
    तपस्या के फलश्वरूप ब्रम्हदेव भीम से प्रसन्न हुए और भीम ने ब्रम्हदेव से शक्तिशाली होने का वर पप्राप्त कर सबसे पहले देवराज इंद्र सहित स्वर्ग लोक पर अपना आधिपत्य स्थापित किया फिर उसने पृथ्वी को जितना आरंभ किया और उसने सबसे पहले कामरूप देश के राजा सुदक्षिण के राज्य पर आक्रमण किया और राजा को पराजित कर उसे कारागार में डाल दिया |
    कामरूप देश के राजा सुदक्षिण  महादेव के भक्त थे | राजा सुदक्षिण ने कारागार में शिवलिंग का निर्माण कर उसकी पूजा करने लगे | तभी भीम कारागार में पहुंचा और सुदक्षिण को पूजा करते देख भीम ने सुदक्षिण के द्वारा निर्मित शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया ऐसा करने पर शिवलिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और भीम को वही भस्म कर दिया | तब राजा और देवताओं ने भगवान शिव को उसी शिवलिंग पर स्थापित होने का आग्रह किया और भगवान शंकर शिवलिंग में विद्यमान हो गए | उस स्थान में भीम का वध करने पर उस शिवलिंग का नाम भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पड़ा |

    7.  काशीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग :-

    काशीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के बनारस में स्थित है | काशी सभी तीर्थ स्थलों में सबसे ऊंचे और विख्यात स्थान में आता है | इस जगह की मान्यता है कि काशी में स्नान करने के बाद अगर भगवान के इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजा अर्चना की जाए तो भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं | ये भी माना जाता है कि अगर प्रलय आया तो भी प्रलय काल में भी काशीविश्वनाथ का नाश नहीं होगा |
    पुराणों में वर्णन है कि इस शिवलिंग को स्वयं परमात्मा द्वारा निर्मित किया गया है और प्रलय कल में भगवान शिव काशी नगरी को अपने त्रिशूल में धारण कर लेते हैं और इस कारण काशी का कभी नाश नहीं हो सकता है | इसलिए यह विश्वेश्वर और काशीविश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से लोक में प्रसिद्ध हैं |

    8.  त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग :-

    यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नाशिक के ब्रम्हगिरि, गोदावरी नदी के तट पर स्थित है | कहा जाता है कि महर्षि गौतम और गोदावरी नदी के आग्रह पर भगवान शंकर यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए थे | भगवान शिव के अनेक नामों में से त्र्यंबकेश्वर के नाम से इस ज्योतिर्लिंग का नाम त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग पड़ा |
    पुराणों में वर्णन है कि बहुत समय तक यहाँ वर्षा नहीं हुई थी | वर्षा न होने के कारण यहाँ वास करने वाले प्राणी यहाँ से जाने लगे तब इस समस्या के निदान हेतु महर्षि गौतम बहुत समय तक तपस्या कर वरुण देव को प्रसन्न किया और वरुण देव ने वहाँ एक दिव्य जलकुंड का निर्माण किया जिसके कारण वहाँ हरियाली फिर से लौट आई जिससे वहाँ निवास करने वाले मनुष्य और अनेक प्राणी फिर से लौट आए |
    एक दिन गौतम ऋषि के पुत्र उस जलकुंड में जल लेने आए और उसी समय कुछ अन्य ऋषि की पत्नियां भी जल लेने जलकुंड में आई | दोनों पहले जल लेने का हट होने लगा | तभी महर्षि गौतम की पत्नि अहल्या वहाँ आई और कहा – ” पहले से ही ये बालक जल के लिए आए हैं और पहले उपस्थित हुए हैं इसलिए इन्हें पहले जल लेने दिया जाए “| इस बात से अन्य ऋषि पत्नियां नाराज़ हो गयी | ये बात उन्होने अपनी पतियों को बताई |
     इस बात से बाकी सभी ऋषि गौतम से बदला लेने के लिए भगवान श्री गणेश जी की स्तुति की | गणेश प्रकट हुए | सभी ऋषियों ने गौतम ऋषि को अपमानित करने के लिए भगवान गणेश से सहायता मांगी | मागवान गणेश ने उन ऋषियों को समझाया की ये गलत है पर ऋषियों के हट के कारण गणेश जी ने उनकी सहायता करने का वचन दिया  उसके बाद गणेश जी एक गाय के रूप में गौतम ऋषि के पास गए और गौतम ऋषि ने गाय को देखकर अपने हाथों से उसे भोजन कराने लगे | उसके तुरंत बाद वह गाय गिर पड़ी और उसकी मृत्यु हो गयी |
    सभी ऋषि और उनकी पत्नियां गौतम ऋषि के पास आए और गौतम ऋषि को गौ हत्या का दोषी ठहराने लगे और उनसे कहने लगे की जब तक आप रहोगे तब तक यहाँ और इस जगह पर अशुभता बनी रहेगी | अपने परिवार को लेकर यहाँ से चले जाओ | ऋषि गौतम वहाँ से दूर एक कुटिया बनके रहने लगे | फिर भी सभी ऋषि उन्हे तप आदि करने से रोकते रहें | तब गौतम ऋषि ने गौ हत्या शूद्धी की बात कही | 
    सभी ऋषियों ने कहा अगर तुम पृथ्वी की परिक्रमा कर ताप करते हो और सौ बार ब्रम्ह्गीरी पर्वत की परिक्रमा कर माँ गंगा को यहाँ लाकर स्नान करो और एक करोड़ शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना करो तब तुम्हारी शुद्धि होगी | गौतम ऋषि और उनकी पत्नि अहल्या तप और भगवान शिव की आराधना में लग गए परिणाम स्वरूप भगवान भोलेनाथ उनकी तपस्या से प्रसन्न हुये और वर मांगने को कहा | 
    गौतम ऋषि ने भगवान शिव से निष्पाप होने का वर मांगा | तब भगवान ने गौतम ऋषि को सम्पूर्ण सत्य से अवगत कराया तब ऋषि ने कहा- ” अगर ये नहीं होता तो मुझे आपके दर्शन नहीं होते| भगवान अगर आप मुझसे प्रसन्न है तो मुझे माँ गंगा प्रदान कीजिये |” उसके पश्चात भगवान शिव ने गंगा को पुनः धरती पर अवतरित होने को कहा तब माँ गंगा ने कहा –” मैं तभी वहाँ वास करूंगी जब महादेव शिवलिंग स्वरूप में यहाँ वास करेंगे और देवता भी वास करेंगे |” भगवान शिव लिंग स्वरूप विद्यमान हो गए |और माँ गंगा गोदावरी नदी के रूप में स्थित हो गयी और यह शिवलिंग त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुई |

    9.  श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग :-

    यज ज्योतिर्लिंग झारखंड के देवघर में स्थित है और शिवपुराण में चीताभूमि के पास स्थित है | शिवपुराण में वर्णन है कि लंकापति राजा रावण कैलाश पर्वत में भगवान शिव की आराधना कर रहे थे | पर बहुत समय तक कठोर ताप करने के बाद भी भगवान शिव रावण से प्रसन्न नहीं हुए थे | तब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने एक एक सर की आहुती देने लगे | ऐसे कर उसने अपने नौ सरों कि आहुती दे दी तत्पश्चात भगवान शिव रावण के सम्मुख प्रकट हुए और रावण के सभी सरों को पुनः प्रदान कर दिया और रावण से वर मांगने को कहा |
     रावण ने उनसे तीनों लोको में सबसे शक्तिशाली होने का वर मांगा और भगवान शिव से निवेदन किया कि –” प्रभु ! आप मेरे साथ लंका चले |”  भगवान शंकर ने कहा – ” रावण तुम मेरे इस शिवलिंग को लंका ले जाओ | मगर इस बात का स्मरण रखना कि अगर तुमने इस लिंग को कहीं भी रखा तो ये वहीं स्थिर हो जाएगा | ” रावण
    शिवलिंग को लेकर लंका चल पड़ा | रास्ते में रावण को एक बालक मिला | बालक ने रावण से कहा – “ऋषिवर आप कहाँ जा रहे हो और आपके हाथ में यह पाषाण कैसा ?” रावण ने कहा – ” मूर्ख बालक ! ये कोई पाषाण नहीं पवित्र शिवलिंग है, और मुझे इसे लंका ले जाना है |” यह सुनकर  बालक ने कहा –” आप इतनी धूप में इस शिवलिंग को लंका ले जा रहे है आपको प्यास लगी होगी | आप इस शिवलिंग को थोड़ी देर रखकार जलपान कर लीजिये | फिर लंका की ओर प्रस्थान कीजिये | पर रावण  ने उस बालक की बात नहीं सुनी और लंका की ओर प्रस्थान करने लगे | तभी बालक ने उसने एक और बार जलपान के लिए अनुरोध किया तब रावण ने बालक से कहा – ” तुम इस शिवलिंग को कुछ समय अपने हाथों में धारण करो मैं नदी से जलपान कर आता हूँ |” यह कहकर रावण नदी  की ओर गया |
    तब बालक ने उस शिवलिंग को भूमि पर रख दिया और शिवलिंग वहीं स्थित हो गया | बालक के रूप में यह भगवान श्री गणेश की लीला थी | जब रावण जलपान के बाद शिवलिंग के पास आया और शिवलिंग को भूमि में स्थित देखकर समझ गया कि यह भगवान की लीला है | फिर रावण ने भगवान शिव की स्तुति की और वहाँ ऋषि और इंद्र सहित सभी देवतागण आ गए | सभी ने भगवान शिव की पूजा की और उस शिवलिंग का नाम वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग रखा | तत्पश्चात रावण लंका चला गया | यह ज्योतिर्लिंग वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है |

    10.  नागेश्वर ज्योतिर्लिंग :-

    यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के द्वारिका पूरी से 17मिल दूर हैं | माना जाता है कि भगवान शिव के इच्छानुसार इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर ज्योतिर्लिंग रखा गया | शिवपुराण के कोटिरुद्र संहिता में वर्णन है कि दारुका नाम की राक्षसी अपने पति दारुक के साथ एक वन में निवास करती थी | दारुका को वरदान मिला था कि वह इस वन को अपने साथ काही भी उड़ा कर कहीं भी ले जा सकती थी |
    दारुका अपने पति के साथ इस वन और आस पास के गाँव में उत्पात मचा रखा था | जिससे तंग आकार लोगों ने महर्षि और्व के पास जाकर अपनी परेशानी बताई | यह सुनकर ऋषि और्व ने राक्षसों को श्राप दिया कि ये राक्षस हिंसा करेंगे और यज्ञ, तप को भंग करेंगे तो उसी समय इन राक्षसों का अंत हो जाएगा | यह सुनकर देवताओं ने राक्षसों पर आक्रमण कर दिया यह सोचकर कि अगर राक्षस युद्ध करेंगे तो नष्ट हो जाएंगे | और युद्ध नहीं करेंगे तो परास्त हो जाएंगे | 
    इस कारण दारुका राक्षसी उस वन को उड़ाकर एक समुद्र के बीच ले गयी | और वहीं निवास करने लगी | एक बार बहुत से नांव उस वन के पास आ पहुंचे | उन नांव में सवार सभी मनुष्यों को राक्षसों ने बंदी बना लिया | मनुष्यों में सुप्रिय नामक एक शिव भक्त भी था | सुप्रिय कारागार में रहकर शिव भक्ति करते थे | और उनके साथी उसके साथ पुजा करते थे |
    जब दारुक राक्षस को यह बात पता चली तो वह पूजा को रोकने और सुप्रिय को मारने वहाँ पहुंचा | सुप्रिय ने अपनी और अपने साथियों की रक्षा के लिए भगवान शिव की प्रार्थना की | अपने भक्त की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव प्रकट हुये और सभी राक्षसों को भस्म कर दिया | 
    यह देखकर दारुक अपनी पत्नि के पास भाग खड़ा हुआ | भगवान शिव ने सुप्रिय को वरदान दिया | सभी इस वन में अपने धर्म का पालन कर सकते हैं और राक्षसों का यहाँ कोई स्थान नहीं होगा यह सुनकर दारुका अत्यंत भयभीत हो गयी | दारुका ने माँ पार्वती की स्तुति शुरू की | और माँ पार्वती से वर मांगा कि मेरे वंश की रक्षा कीजिये | माँ पार्वती ने दारुका को आश्वासन दिया | माँ पार्वती ने भोलेनाथ से कहा –” हे नाथ ! आपका वचन सत्य है पर क्या ये राक्षस और उनकी पत्नियां अपने परिवार के साथ रह सकती है?” तब भगवान शिव  ने   तथास्तु कहा और अपने भक्तो के लिए  ज्योतिर्लिंग  में विद्यमान हो गए |
    यह ज्योतिर्लिंग नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ |

    11.   श्री रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग :- 

    यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडू राज्य के रामनद जिले में है | रामेश्वरम हिंदुओं का पवित्र तीर्थ स्थल है | मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग की जो पुजा करता है वह सदैव रोग मुक्त रहता है | उत्तर में काशी विश्वनाथ की मान्य है, और दक्षिण में रामेश्वरम | इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना स्वयं भगवान श्री राम ने की थी ||
     पुरानों में वर्णन है जब रावण सीता माता को हरण कर लंका ले गए तब भगवान राम भाई लक्ष्मण और वानर सेना के साथ सीता माता की तलाश करते करते दक्षिण आ पहुंचे और भगवान राम ने देखा की समुद्र तट से विशाल लंका नगरी उस पार स्थित है | तब भगवान राम के सामने इस विशाल समुद्र को पार करने की समस्या उत्पन्न हो गयी | 
    भगवान राम सोचने लगे कि किस तरह इस विशाल समुद्र को पार कर लंका पति रावण को पराजित किया जाए | भगवान राम ने समुद्र तट की रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और अपने आराध्य भगवान शिव की आराधना करने लगे | भगवान राम ने भोलेनाथ से प्रार्थना की – ” हे गंगाधर ! आपके सहयोग के बिना मेरा कार्य अधूरा है | हे महेश्वर ! आप मुझपर कृपा करे |” 
    और भगवान शिव वहाँ पर प्रकट हो गए | भगवान श्री राम ने कहा कि – ” हे भोलेनाथ ! आप मेरा मार्ग प्रशस्त करे और लोक कल्याण के लिए इस शिवलिंग में वास करे |” 
    इस प्रकार भगवान शिव वहाँ पर विराजमान हो गए | इस तरह यह ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम के नाम से विख्यात हुआ |

    12.   घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग :-

    यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का 12वां ज्योतिर्लिंग है | यह ज्योतिर्लिंग राजस्थान के शिवर नाम के गाँव में स्थित है | भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग का वर्णन हमें शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता में मिलता है | दक्षिण दिशा में देवगिरि पर्वत के पास एक कुटिया में शुधर्मा नाम का ब्राम्हण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहता था | शुधर्मा भगवान शिव का भक्त था | वह प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करता था | दोनों का जीवन बहुत ही सुखमय था |
    लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी | इसके कारण वहाँ रहने वालों से व्यंग्यवाक्य सुनने पड़ते थे | इस बात से दुःखी होकर सुदेहा ने अपनी पति से कहा वंश को आगे बढ़ाने का दायित्व संतान का होता और मुझे तो संतान की प्राप्ति नहीं हो रही | इसलिए आप मेरी बहन घुश्मा से विवाह कर लीजिये पर शुधर्मा ने इंकार कर दिया | फिर भी पत्नी हट के कारण शुधर्मा ने सुदेहा की बहन घुश्मा से विवाह कर लिया | घुश्मा अपनी बहन सुदेहा के कहने पर 101 शिवलिंग बनाकर प्रतिदिन उसकी पुजा अर्चना कर नदी में शिवलिंग का विसर्जन करती थी |
    भगवान शिव के आशीर्वाद से घुश्मा को पुत्र की प्राप्ति हुई | इससे घुश्मा का मान बढ्ने लगा और सुदेहा को अपनी ही बहन से ईर्षा होने लगी | समय पर उस पुत्र का विवाह हो गया और पुत्र वधू के आ जाने से सुदेहा की ईर्षा चरम सीमा पर पहुँच गयी | एक रात सुदेहा ने सोये हुये पुत्र को मार डाला | और उसके शरीर को नदी में बहा दिया | सुबह घुश्मा और शुधर्मा पुजा कर रहे थे तभी पुत्र वधू ने खून देखकर रोने लगी और सभी को बताया | पर पुजा में विलीन पति पत्नी इस बात से विचलित नहीं हुए | वहीं सुदेहा रोने का नाटक कर रही थी |
    पूजा के पश्चात प्रतिदिन की भांति घुश्मा शिवलिंग का नदी में विसर्जन किया और उसके बाद उसने अपने पुत्र को सामने जीवित खड़ा पाया | तभी नदी से दिव्य ज्योति प्रज्वलित हुई और भगवान शिव उस ज्योति से प्रकट हुए | भगवान शिव ने सुदेहा का अपराध घुश्मा को बताया और भगवान ने सुदेहा को दंड देना चाहा | तभी घुश्मा ने भगवान की – ” हे भगवन ! आप सुदेहा को क्षमा प्रदान करे |” इस बात से भगवान घुश्मा से प्रसन्न हुये और वर मांगने को कहा तब घुश्मा ने कहा कि – ” हे प्रभु ! अगर आप मेरी भक्ति से प्रसन्न है तो आप सदा के लिए यहीं वास करे और मेरे नाम से आपका सुमिरन हो | ” और भगवान ने शिव ने ज्योतिर्लिंग के रूप में वास किया | इस प्रकार यह ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ |

    Leave a Reply

    Your email address will not be published.